Tuesday, 6 October 2015

रायपुर का मेरा पहला और अंतिम स्कूल

कुछ अपरिहार्य कारणों से हमारे पूरे परिवार को रायपुर आना पड़ा। उस समय मध्यप्रदेश का यह शहर प्रदेश के बाकी कुछ शहरों के पीछे-पीछे चला करता था। दिल्ली जैसे महानगर की तुलना में एक शांत, सुस्त, हड़बड़ी-विहीन कम आबाादी वाला शहर। किसी भी दिशा में चले जाओ आधे घंटे से ज्यादा नहीं लगता था शहर पार करने में। यहां आने के बाद देवर की शादी भी हो गयी।  घरेलू काम के लिए दो मददगार महिलाएं थीं। सो घर का ज्यादा काम नहीं था। ऐसे में माँ (सासु माँ) से पास के स्कुल में पढ़ाने की इजाजत तुरंत मिल गयी। दिल्ली का तमगा साथ था वहां भी मुझे हाथों-हाथ ले लिया गया। स्कूल का समय भी कम ही था, सुबह साढ़े आठ से दोपहर डेढ़ बजे तक।   
स्कूल के पहले दिन मुझे यह देख बहुत अच्छा लगा कि यहां एक छोटा भारत बसता है। पंजाबी, बंगाली, मारवाड़ी, तमिल, क्रिश्चियन हर धर्म और प्रदेश की महिलाएं वहां एक परिवार की तरह थीं। शुरू में वे सब मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मैं कोई अजूबा होऊं। उनके अनुसार तो लोग दिल्ली जाने के लिए तिकड़म भिड़ाते रहते हैं और मुझे वहां से यहां आना पड़ा जैसे मुझे वनवास मिल गया हो। मेरी शुरुआत छोटी क्लासों से की गयी। पढ़ाने के दौरान भी पुरानी अध्यापिकाओं के कान और आँखें मेरी क्लास की तरफ ही लगी रहती थीं। जैसे हर क्षण मुझे तौला जा रहा हो। बच्चे तो एक जैसे ही होते हैं चाहे रायपुर हो या फिरोजपुर। इसी से किसी भी तरह की परेशानी मुझे नहीं होती थी पुराने अनुभव के कारण। धीरे-धीरे बहनापा पनपने लगा, माहौल घरेलू होता चला गया और में अच्छी तरह उन सब से घुल-मिल गयी।    

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