Wednesday, 28 October 2015

ललिता का बेटा

स्कूल में कार्य करने के दौरान तरह-तरह के अनुभवों और लोगों से दो-चार होने का मौका मिलता रहता था। यहां की सबसे अच्छी बात थी कि स्कूल में समाज के हर दर्जे के परिवार के बच्चे बिना किसी भेद-भाव के शिक्षा पाते थे। उनमें कार से आने वाले बच्चे पर भी उतना ही ध्यान दिया जाता था जितना मेहनत-मजदूरी करने वाले घर से आने वाले बच्चे पर। किसी भी तरह का अतिरिक्त आर्थिक भार किसी पर नहीं डाला जाता था। फीस से ही सारे खर्चे पूरे करने की कोशिश की जाती थी। इसीलिए स्टाफ की तनख्वाह कुछ कम ही थी पर माहौल का अपनापन और शांति यहां बने रहने के लिए काफी थी। इसीलिए इतना लंबा समय कब गुजर गया पता ही नहीं चला।                        
पर इतने लंबे कार्यकाल में बच्चों को अपने सामने बड़े होते और जिंदगी में सफल होते देख खुशी और तसल्ली जरूर मिली। ऐसा ही एक छात्र था, राजेन्द्र, उसकी माँ ललिता हमारे स्कूल में ही आया का काम करती थी। एक दिन वह अपने चार-पांच साल के बच्चे का पहली कक्षा में दाखिला करवा उसे मेरे पास ले कर आई और एक तरह से उसे मुझे सौंप दिया। वक्त गुजरता गया। मेरे सामने वह बच्चा, बालक और फिर युवा हो बाहरवीं पास कर महाविद्यालय में दाखिल हो गया। इसी बीच ललिता को तपेदिक की बीमारी ने घेर लिया। पर उसने लाख मुसीबतों के बाद भी राजेन्द्र की पढ़ाई में रुकावट नहीं आने दी और एक दिन वह द्वितीय श्रेणी में सनातक की डिग्री ले एक जगह काम करने लग गया। वह लड़का कुछ कहता नहीं था पर उसकी यही इच्छा थी कि वह अपने माँ-बाप को सदा खुश रख सके। अच्छे चरित्र के उस लडके ने अपने अभिभावकों की सेवा में कोई कसर नहीं रख छोड़ी। इस तरह इस परिवार ने कुछ समय ही ज़रा सुख देखा था कि एक दिन ललिता के पति का तपेदिक से देहांत हो गया। बेटा माँ के प्रति पूरी तरह समर्पित था पर भगवान को कुछ और ही मंजूर था, ललिता अपने पति का बिछोह और अपनी बिमारी का बोझ ज्यादा दिन नहीं झेल पाई और पति की मौत के साल भर के भीतर ही वह उसके पास चली गयी।

आज राजेन्द्र अपने अपने परिवार के साथ रह रहा है। पर जब कभी भी मुझसे मिलता है तो उसकी विनम्रता, विनयशीलता मुझे अंदर तक छू जाती है और मेरे सामने वही पांच साल का पहली कक्षा का मासूम सा बच्चा आ खड़ा होता है। ऊपर से उसके माँ-बाप उसे देखते होंगे तो उनकी आत्मा भी उसे ढेरों आशीषों से नवाजती होगी।  

Sunday, 25 October 2015

मेरी सहेली

मैं पंजाब की वह केरल की। खान-पान, भाषा-रिवाज, रहन-सहन सब कुछ अलग होते हुए भी ऐसी क्या बात थी जिसने हमारे बहनापे को इतनी मजबूती दे दी।

कुछ भी हो चाह कर भी पुरानी यादों को दर-किनार नहीं जा सकता। फिर वहाँ की, जहां जिंदगी के बेहतरीन तीस साल गुजरे हों, भुलाना मुश्किल ही होता है। आज भी अपने स्कूल के एक-एक दिन चित्र-पट की तरह मेरी आँखों के सामने घूम जाते हैं। मेरे वहाँ पढ़ाना शुरू करने के करीब साल भर बाद एक मलयाली युवती ने भी उस स्कूल को ज्वाइन किया।  नाम था गीता त्यागराजन। सीधी-सादी, कम बोलने वाली गीता से, जिसे मैं गीतू कह कर बुलाने लगी थी, मेरी अच्छी पटने लगी। धीरे-धीरे दोनों दो जिस्म एक जान की तरह जाने, जाने लगे। अलग संस्कृति, रीती-रिवाज होने के बावजूद दोनों परिवार एक-दूसरे के सुख-दुःख, हारी-परेशानी, उत्सव-त्यौहार में सम्मलित होने लगे थे। मेरे सेवानिवृत होने और दिल्ली आने का जितना दुःख उसे हुआ उतना तो घर वालों को भी नहीं हुआ था। हफ़्तों पहले से ही वह उदास रहने लगी थी ज़रा सी बात पर उसके आंसू निकल आते थे। बार-बार मुझे एक-दो साल और काम करते रहने के लिए कहती रहती थी। क्योंकि स्कूल की कमेटी ने भी मुझसे पूछा था कि यदि मैं चाहूँ तो रिटायरमेंट का समय आगे बढ़ाया जा सकता है। पर अब बच्चों के पास जाने की इच्छा ज्यादा बलवती थी। वैसे भी आज नहीं तो कल ऐसा होना ही था और समय के अनुसार खुद को ढालना तो था ही। फिर भी कभी-कभी सोचती हूँ तो बड़ा अजीब सा लगता है, कहाँ मैं पंजाब की वह केरल की। खान-पान, भाषा-रिवाज, रहन-सहन सब कुछ अलग होते हुए भी ऐसी क्या बात थी जिसने हमारे बहनापे को इतनी मजबूती दे दी। मेरी ज़रा सी तकलीफ पर वह सहारा बन आ खड़ी होती, बिना अपने घर और घरवालों की चिंता किए। उसके मिस्टर भी बहुत को-आपरेटिव स्वभाव के धर्म-भीरु इंसान हैं। शर्माजी के साथ उनकी भी गहरी छनती है।  जबकि मैं चाह कर भी उसके दस प्रतिशत भी काम नहीं आ पाती थी।    

अब सामने जनवरी में उसकी बिटिया की शादी है सोच रही हूँ कि सब ठीक रहा तो एक चक्कर लगा लूँगी। महीना होने जा रहा है पर शायद ही कोई दिन ऐसा गया होगा जब हमने आपस में बात नं की हो। वैसे समय खुद ही तकलीफ देता है तो मरहम भी वही लगाता है। इंसान धीरे-धीरे अपने गम गलत करना सीख ही जाता है।भगवान से यही प्रार्थना है कि वह और उसका परिवार जहां भी रहे सदा सुखी रहे।       

Wednesday, 21 October 2015

जेहि विधि राखे राम उही विधि रहिए

इंसान का शरीर ठीक हो तभी सब कुछ संभव है। इसीलिए निरोगी काया को प्राथमिकता दी जाती है। मुझे याद नहीं कि मैंने नवरात्रों में व्रत रखने कब से शुरू किए। मायके से चली आ रही यह आदत, इसे आदत ही तो कहेंगे, ससुराल में भी बिना किसी बाधा के वर्षों जारी रही। पर इस बार पहली दफा अपने शरीर के चलते नौ दिनों में किसी भी दिन उपवास नहीं रख सकी। अफ़सोस जरूर है पर पिछले दिनों नर्सिंग होम जाने की घटना ने मजबूरी -वश ऐसा नहीं होने दिया।  इसी मजबूरी के चलते कई नियम-कायदे अपनी जगह छोड़ गए। फिर लगता है वह तो सबकी माँ है और माँ तो कभी बच्चों से ना नाराज होती है  नाहीं कोई गिला-शिकवा करती है। उसने जैसा चाहा होगा वैसा ही हुआ। पहले जब पूरे व्रत रखे जाते थे तब भी वही शक्ति देती थी काम करने की, क्योंकि स्कूल में तो इतनी छुट्टियां होती नहीं थीं, और मेरी आदत भी नहीं थी कि कुछ ना कुछ खाती रहूं, फिर भी कभी थकान या कोई तकलीफ नहीं हुई थी। अब शरीर उतना साथ नहीं देता तो जैसा हो पाया वैसा किया।  

हमारी तो इतनी उम्र हो गयी अभी भी सारे काम खुद करने से ही तसल्ली मिलती है। पर आज की पीढ़ी खुद पर जुल्म करते दिखती है तो मुझे चिंता होती है उनके भविष्य की।  रात देर तक जगना, सुबह फिर हड़बड़ी में भागना, ना खाने का ठिकाना, नाहीं सोने का वक्त ! उम्र बढ़ने पर इसका असर पड़ना ही है। पर आज की आपा-धापी वाली जिंदगी में ये लोग भी क्या करें !! बस "जेहि विधि रखे राम उही विधि रहिए" सोच  कर रह जाना पड़ता है। 

Tuesday, 20 October 2015

दिनचर्या की अनियमितता भारी भी पड सकती है

समय तो अपनी गति से चलता रहता है। उसी के अनुसार हम सब को अपने-आप को ढालना पड़ता है। सब कुछ उसके अनुसार रहे तो सब ठीक-ठाक चलता है, पर जैसे ही आपने उसके विपरीत कुछ करने का उपक्रम किया उसकी भृकुटि टेढ़ी हो जाती है। इसीलिए ज्ञानी जनों का कहना है कि हर काम समय पर होना चाहिए। 

लोगों का तो पता नहीं पर मैं अपनी सेवानिवृति के दिन का बेसब्री से इंतजार करती रहती थी। उसके बाद बच्चों के पास जा रहने, कुछ व्यवस्थित करने का काम जो टलता आ रहा था। पर यह बात दिमाग में नहीं आती थी कि समय के साथ-साथ शरीर भी तो पहले जैसा दस-दस घंटे काम करने लायक नहीं रह जाता है। आखिरकार वह दिन आ ही गया और हम दोनों बोरिया-बिस्तर समेट दिल्ली आ गए।        

मुझे दो साल पहले अपने डायबिटीक होने का पता चला था, वह भी अचानक।  उस दिन तो भगवान की दया से ही बचाव हो गया था। पर उसके बाद हर काम समयानुसार करते रहने से कोई तकलीफ नहीं हुई। पर परिवेश बदलते ही सारा कुछ उलट-पलट होना स्वाभाविक था। सामान लाने, संभालने, टिकाने में अपने प्रति हुई थोड़ी सी लापरवाही ने बड़ा झटका दे दिया। पिछले हफ्ते रविवार की सुबह अचानक शुगर की कमी के कारण तबियत ऐसी बिगड़ी कि शर्मा जी और बच्चे सभी घबड़ा गए। मुझे तो खैर होश ही नहीं था इन्हीं लोगों ने बाद में सब बताया कि मैं किसी को पहचान ही नहीं पा रही थी। मेरे भाई-भाभी भी तुरंत आ गए।  भाभी ने मुझे संभाला और फिर नर्सिंग होम में दाखिल करवाया गया।  दो दिन बाद घर आई, चार पांच दिन बाद गाडी पटरी पर आती नज़र आई है। 

डाक्टर की यही हिदायत है कि अब ज़रा भी गफलत न कर, घडी की सुइयों के अनुसार अपने को ढालना है।  हर काम, खासकर भोजन और दवा, अपने समय, पर होना चाहिए। जानते तो सभी हैं पर आज-कल की भाग-दौड़ की जिंदगी में गफलत हो ही जाती है। फिर भी कोशिश यही रहनी चाहिए कि तंदरुस्ती बरकरार रहे क्योंकि वही हजार नियामतों के बराबर होती है। 

Thursday, 8 October 2015

समय की पाबंदगी

शादी-ब्याह में बेचारे समय को कौन पूछता है, खासकर पंजाबियों के यहां तो दो-तीन घंटे की बात कोई मायने ही नहीं रखती, ना ही उभय-पक्ष इस पर ध्यान देते हैं। पर उस समय हम सब आश्चर्य चकित रह गए जब ठीक छह बजे बारात दरवाजे पर आ खड़ी हुयी। थोड़ी हड़बड़ी तो हुई पर साढ़े आठ बजते-बजते पंडाल तकरीबन खाली हो चुका था। आदतन देर से आने वाले दोस्त-मित्रों को शायद पहली बार ऐसे "समय" से दो-चार होना पड़ा था। 

मेरे स्कूल का घर से पैदल पांच-सात मिनट का रास्ता था। ऐसा कहा जाता है कि नजदीक वाले ही ज्यादातर विलंब से पहुंचते हैं। पर मुझे शायद ही कभी देर हुई हो। देख-सुन कर अच्छा लगता था जब लोग कहते थे कि मिसेज शर्मा के आने पर अपनी घडी मिलाई जा सकती है। समय की पाबंदगी मुझे अपने पापा से विरासत में मिली थी। यह संयोग ही था कि मेरे ससुराल में भी हर काम घडी की सुइयों के साथ चलता था। वहां तो बाबूजी के काम के साथ जैसे घडी को चलना पड़ता था। शर्मा जी भी समय के पूरे पाबंद हैं, लेट-लतीफी उन्हें ज़रा भी पसंद नहीं है। इसी पाबंदगी के कारण हमारे दोनों परिवारों का पहला परिचय भी लोगों के लिए एक उदाहरण बन गया था। 

बात मेरी शादी के समय की है। दिसंबर का महीना था। दिल्ली की ठंड अपने चरम पर थी। इसी को देखते हुए स्वागत समारोह छह बजे शाम का और रात्रि भोज का समय सात बजे का रखा गया था। शादी-ब्याह में बेचारे समय को कौन पूछता है, खासकर पंजाबियों के यहां तो दो-तीन घंटे की बात कोई मायने ही नहीं रखती, ना ही उभय-पक्ष इस पर ध्यान देते हैं। पर उस समय हम सब आश्चर्य चकित रह गए जब ठीक छह बजे बारात दरवाजे पर आ खड़ी हुयी। थोड़ी हड़बड़ी तो हुई पर साढ़े आठ बजते-बजते पंडाल तकरीबन खाली हो चुका था। आदतन देर से आने वाले दोस्त-मित्रों को शायद पहली बार ऐसे "समय" से दो-चार होना पड़ा था। इस बात पर मेरी सहेलियां शर्मा जी से अक्सर मजाक में कहती रहीं कि आप को बड़ी जल्दी थी दीदी को ले जाने की। 

समय की कीमत को समझो, इस बेशकीमती चीज की कद्र करो, इसे फिजूल बरबाद न करो, यह एक बार गया तो फिर कभी हाथ नहीं आता, आता है तो सिर्फ पछतावा। इस बात को मैं सदा अपने छात्रों को समझाती रही हूँ। मुझे ख़ुशी है कि मेरे अपने बच्चे भी इस परंपरा को चलाए रख रहे हैं। 

Tuesday, 6 October 2015

रायपुर का मेरा पहला और अंतिम स्कूल

कुछ अपरिहार्य कारणों से हमारे पूरे परिवार को रायपुर आना पड़ा। उस समय मध्यप्रदेश का यह शहर प्रदेश के बाकी कुछ शहरों के पीछे-पीछे चला करता था। दिल्ली जैसे महानगर की तुलना में एक शांत, सुस्त, हड़बड़ी-विहीन कम आबाादी वाला शहर। किसी भी दिशा में चले जाओ आधे घंटे से ज्यादा नहीं लगता था शहर पार करने में। यहां आने के बाद देवर की शादी भी हो गयी।  घरेलू काम के लिए दो मददगार महिलाएं थीं। सो घर का ज्यादा काम नहीं था। ऐसे में माँ (सासु माँ) से पास के स्कुल में पढ़ाने की इजाजत तुरंत मिल गयी। दिल्ली का तमगा साथ था वहां भी मुझे हाथों-हाथ ले लिया गया। स्कूल का समय भी कम ही था, सुबह साढ़े आठ से दोपहर डेढ़ बजे तक।   
स्कूल के पहले दिन मुझे यह देख बहुत अच्छा लगा कि यहां एक छोटा भारत बसता है। पंजाबी, बंगाली, मारवाड़ी, तमिल, क्रिश्चियन हर धर्म और प्रदेश की महिलाएं वहां एक परिवार की तरह थीं। शुरू में वे सब मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मैं कोई अजूबा होऊं। उनके अनुसार तो लोग दिल्ली जाने के लिए तिकड़म भिड़ाते रहते हैं और मुझे वहां से यहां आना पड़ा जैसे मुझे वनवास मिल गया हो। मेरी शुरुआत छोटी क्लासों से की गयी। पढ़ाने के दौरान भी पुरानी अध्यापिकाओं के कान और आँखें मेरी क्लास की तरफ ही लगी रहती थीं। जैसे हर क्षण मुझे तौला जा रहा हो। बच्चे तो एक जैसे ही होते हैं चाहे रायपुर हो या फिरोजपुर। इसी से किसी भी तरह की परेशानी मुझे नहीं होती थी पुराने अनुभव के कारण। धीरे-धीरे बहनापा पनपने लगा, माहौल घरेलू होता चला गया और में अच्छी तरह उन सब से घुल-मिल गयी।    

Sunday, 4 October 2015

मेरे शिक्षण का सफर

अब जब शिक्षण जगत से अवकाश मिल गया है तो आश्चर्य सा होता है कि कैसे अनायास ही मैं इससे जुड़ गयी थी। बात शायद 1979-80 की है। तब हम दिल्ली के राजौरी गार्डेन में रहते थे। सामने का घर एक संपन्न पंजाबी मल्होत्रा परिवार का था, जिनकी पुत्र वधु शौकिया तौर पर आस-पास के बच्चों को पढ़ाया करती थी। देखते ही देखते बच्चों की संख्या अच्छी-खासी हो गयी थी। संभालना थोड़ा कठिन हो चला था।  इसी को देखते हुए उसने मुझसे साथ देने की बात कही, उन दिनों मैं भी दोपहर को खाली ही थी सो मुझे भी समय बिताने का मौका मिल रहा था। समय देना था एक घंटा जिसके एवज में सौ रुपये की आमदनी थी। वैसे भी पढ़ाना मेरे पसंदीदा कामों में से एक था। इस तरह शिक्षण के काम से मेरा पहला परिचय हुआ। कुछ दिनों बाद पास ही के एक स्कूल में पढ़ाने के प्रस्ताव को भी स्वीकार कर लिया।     
    
फिर 1988-89 में रायपुर आना हुआ। दिल्ली के स्कूल के प्रमाण पत्र ने बड़ी आसानी से यहां के एक स्कूल में काम दिलवा दिया। जहां जिंदगी के 26 -27 साल, उस स्कूल को फलते-फूलते-बढ़ते, तरह-तरह के अनुभवों से दो-चार होते, कैसे बीत गए पता ही नहीं चला।  बस एक ही झोँक रहती थी कि मुझे जिन बच्चों की जिम्मेदारी मिली है वह सही ढंग से पूरी हो जाए। गर्मी-सर्दी-बरसात, कभी नागा नहीं किया। इतने सालों में अँगुलियों पर गिन सकी जा सकें उतनी ही छुट्टियां होंगी मेरे नाम।  उस मेहनत का फल भी मिला है मुझे। आज के इस युग में जब काम निकल जाने के बाद रिश्तेदार भी आँख बचा कर कन्नी काट जाते हैं वहीँ कई बार  अक्सर ऐसा होता है कि जानी-अंजानी, दूर-दराज, अन्य प्रांतों में भी कोई आ कर पैर छू कर अपनी पत्नी और बच्चों को बताता  है कि ये मेरी मैम रही हैं स्कूल में तो लगता है जीवन के वे वर्ष यूँ ही नहीं बीते, समय सार्थक हो कर ही गुजरा है।